मैं जब छोटा था तुम अक्सर कहा करती थी कि बेटा कभी तो हरी सब्जी खा लिया कर भिंडी लौकी टिंडा करेला ना जाने कहां कहां से इतनी सब्जियों ढूंढ कर जाती थी और मुझे खिलाने की कोशिश करती पर मैं तो इन सब्जियों का नाम से ही इतने खौफ ज्यादा हो रखा था कि इन्हें खाना तो दूर की बात मुझे इनकी शक्ल तब से नफरत थी एक मुद्दत बाद मां ने भी बोलना छोड़ दिया और हरी सब्जी से भी मेरी दूरी बढ़ गई।
कुछ सालों बाद मुंबई आकर रहने लगा तो कैंटीन मैं कभी भिंडी जिकर हो जाता तुम्हें भूख से दोस्ती करना आसान समझता
पर जनाब,
मेरी किस्मत में तो और ही लिखा था कुछ दिनों बाद एक लड़की के लिए दिल में गिटार नहीं पूरा आर्केस्ट्रा बजने लगा और मैं बात बात पर से मिलने का बहाने ढूंढने लगा और उसी ने मुझे कहा और एग्जाम खत्म होने के बाद हम कहीं डिनर पर चले लेकिन इस हम में दो नहीं तीन लोग थे मैं वह और हमारी कॉमन फ्रेंड कोई बात नहीं ऐसा भी ठीक है वरना कभी मिलने का प्लान बना और ना कभी डिनर हुआ एक रोज में कोई काम में था और बस निकला ही था कि सुबह से कुछ खाया पिया नहीं था बेहद भूखा था और मेरी उस कॉमन फ्रेंड का कॉल आया और उसने बोला कि "वह उस लड़की के घर पर है तुम यहां आकर थोड़ा टाइम स्पेंट कर सकते हो" मौका अच्छा था मैं चला गया वहां जाने के बाद मेरे कॉमन फ्रेंड ने मुझसे पूछा
"कि तुमने सुबह से कुछ खाया है" जिसका मैंने जवाब दिया कि "मुझे सुबह से टाइम ही नहीं मिला"
उस पर मोहतरमा भड़क गई उन्होंने बोला
"कैसे टाइम नहीं मिला बहुत बड़े आदमी हो गए हो तुम सुनो तुम चुपचाप बैठे मैं तुम्हारे लिए कुछ बना के ले आती हूं भिंडी खा लेते हो ना"
भिंडी बस यूं समझ लो इस मूर्ति ने सिर हिला दिया उसके आंखों में गुस्सा देखकर ना बोलने की हिम्मत ना हुई जिस इंसान ने भिंडी से शिद्दत से नफरत निभाई वह उस रोज भिंडी के साथ चार पराठे कैसे खा गया किसी को नहीं पता।
खैर आज की भाषा में कहूं तो
"उसने मेरा फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट ना किया हो पर मुझे मेरी जिंदगी का फ्रेंड जरूर मिल गया "भिंडी"
उसका ना होने का गम मैंने लफ्ज़ों के मसालो से छुपा लिया करता हूं"
जब भी उसकी याद आती है चार पराठे और भिंडी खा लिया करता हूं |
इस पूरे किस्से से मैंने कुछ सिखा या नहीं मुझे नहीं पता पर इतना जरूर सिखा कि प्यार आप को बदल देता है



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